नवरात्रि में छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है।

    जानिए कैसे करें मां कात्यायिनी की पूजा? क्या है विधि, मंत्र और क  था


    मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत चमकीला और भव्य है। इनकी चार भुजाएं हैं। मां कात्‍यायनी सिंह की सवारी करती हैं और उनका पसंदीदा रंग लाल है

    पूजा विधि: नवरात्रि के छठे दिन यानि कि षष्‍ठी को स्‍नान कर लाल या पीले रंग के वस्‍त्र पहनें। सबसे पहले घर के पूजा स्‍थान या मंदिर में देवी कात्‍यायनी की मूर्ति अथवा तस्वीर स्‍थापित करें। अब गंगाजल से छिड़काव कर शुद्धिकरण करें और मां की प्रतिमा के आगे दीपक रखें। अब हाथ में फूल लेकर मां को प्रणाम कर उनका ध्‍यान करें। इसके बाद उन्‍हें पीले फूल, कच्‍ची हल्‍दी की गांठ और शहद अर्पित करें। धूप-दीपक से मां की आरती उतारें। आरती के बाद सभी में प्रसाद वितरित कर स्‍वयं भी ग्रहण करें।

    ध्यान:
    वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
    सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्वनीम्॥
    स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
    वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥
    पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालंकार भूषिताम्।
    मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
    प्रसन्नवदना पञ्वाधरां कांतकपोला तुंग कुचाम्।
    कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम॥

    स्मेरमुखीं शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोअस्तुते॥
    पटाम्बर परिधानां नानालंकार भूषितां।
    सिंहस्थितां पदमहस्तां कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥
    परमांवदमयी देवि परब्रह्म परमात्मा।
    परमशक्ति, परमभक्ति,कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥

    मां कात्यायनी की कथा: कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे, उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए। इन्हीं कात्य के गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे। इन्होंने मां पराम्बा की उपासना करते हुए कई वर्षों तक बड़ी कठिन तपस्या की थी। उनकी इच्छा थी कि मां भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें, उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां भगवती ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। कुछ समय पश्चात जब दानव महिषासुर का अत्याचार धरती पर बढ़ गया तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों ने अपने-अपने तेज का अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन्न किया। महर्षि कात्यायन ने सर्वप्रथम इनकी पूजा की जिस वजह से यह कात्यायनी कहलाईं। वहीं, पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार गोपियों ने श्रीकृष्‍ण को पति रूप में पाने के लिए यमुना नदी के तट पर मां कात्‍यायनी की ही पूजा की थी।

    मां कात्यायनी की आरती: 
    जय कात्यायनि मां, मैया जय कात्यायनि मां।
    उपमा रहित भवानी, दूं किसकी उपमा॥
    मैया जय कात्यायनि, गिरजापति शिव का तप, असुर रम्भ कीन्हां।
    वर-फल जन्म रम्भ गृह, महिषासुर लीन्हां॥
    मैया जय कात्यायनि, कर शशांक-शेखर तप, महिषासुर भारी।
    शासन कियो सुरन पर, बन अत्याचारी॥
    मैया जय कात्यायनि, त्रिनयन ब्रह्म शचीपति, पहुंचे, अच्युत गृह।
    महिषासुर बध हेतु, सुर कीन्हौं आग्रह॥
    मैया जय कात्यायनि, सुन पुकार देवन मुख, तेज हुआ मुखरित।
    जन्म लियो कात्यायनि, सुर-नर-मुनि के हित॥
    मैया जय कात्यायनि, अश्विन कृष्ण-चौथ पर, प्रकटी भवभामिनि,
    पूजे ऋषि कात्यायन, नाम काऽऽत्यायिनि॥
    मैया जय कात्यायनि, अश्विन शुक्ल-दशी को, महिषासुर मारा।।

    मां कात्यायनी के मंत्र:
    चंद्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
    कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥

    कात्यायनी महामाये , महायोगिन्यधीश्वरी।
    नन्दगोपसुतं देवी, पति मे कुरु ते नमः॥

         Suresh Jangid

    Comments

    Popular posts from this blog

    परिहारों की कुलदेवी : गाजणमाता मंदिर

    आज नवरात्रि के आठवें दिन होती है महाष्टमी, इस दिन करें महागौरी की पूजा