पुराने समय में हम खाना बनते देखते थे

आज रविवार है और शायद ही किसी के घर शाम का खाना बना हो पुराने समय में हम खाना बनते देखते थे, हमारे समय मे रसोईघर में मां के साथ लगभग पूरा परिवार  होता था विशेषकर सर्दियों में,  हम बच्चे चूल्हे के इर्द- गिर्द  बैठकर ठंडी भगाते थे ,शरारते करते थे, जलती हुई लकड़ी को मुंह मे डालकर बीड़ी की तरह कस भी लगाते थे, अहा! क्या दृश्य होता था  तवे पर गर्म गर्म सोगरे बनते जाते थे , सर्दियों की वजह से घी जम जाता था सो जितना हमसे  निकलता था इतना बड़ा घी का लोंदा सोगरे पर रख देते थे और घी को बर्फ की तरह पिघलते देखते थे ,  हमारे इस अंदाज पर तवा हंसता था और मां कहती थी-- छोकरो  तवो हसे है कोय परोमणओ आवये  चूल्हे की आगण पर बैठने के लिए हम  आपस मे जब लड़ते थे तब मां  बारी बारी से  अपनी गोद मे हमे ले लेती थी  साक्षात अन्नपूर्णा देवी  जैसी  मां हर घर मे होती थी । अब तो मालूम ही नही कब खाना बनता है, कौन बनाता है,   पहले ममतामयी मां को देखते देखते खाना खाते थे  अब मोबाइल देखते देखते यूँही जबरन मुंह मे  निवाला ठूसते है।

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