केले लेकर अपने रिश्तेदारों के घर पहुँचने वाली आख़री पीढ़ी भी अब समाप्ति के कगार पर है शायद l अब तो रिश्तेदारों की ऐसी स्थिति हो गई है कि ख़ाली हाथ हिलाते हुए पहुँचते हैं औऱ घर में घुसते ही कराह उठते हैं...." बुआ इस फोन का चार्जर है क्या ?" जब 2 रूपए प्रति मिनट काल लगती थी और किसी किसी के पास फोन होते थे l सब एक दूसरे को फोन करते थे। आज प्रत्येक व्यक्ति के पास फोन है सबकी काल फ्री है फिर भी कोई किसी को फोन नहीं करता सिवाय जरुरत पड़ने के अलावा l जब इतने साधन नहीं थे रिश्तेदारों के घर पर कई कई दिन रहते थे। आज लगभग सभी के पास मोटरसाइकिल है सिर्फ एक दो घण्टे के लिए रुकते हैं। वो भी क्या दिन थे बड़ी ख़ुशी होती थी जब कोई रिश्तेदार घर पर आता था इस टेक्नोलॉजी के दौर में भले ही हम बहुत आगे निकल आएं हो परन्तु रिश्तों को बहुत पीछे छोड़ आएं हैं। :सर्वे भवन्तु सुखिनः
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पुराने समय में हम खाना बनते देखते थे
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आज रविवार है और शायद ही किसी के घर शाम का खाना बना हो पुराने समय में हम खाना बनते देखते थे, हमारे समय मे रसोईघर में मां के साथ लगभग पूरा परिवार होता था विशेषकर सर्दियों में, हम बच्चे चूल्हे के इर्द- गिर्द बैठकर ठंडी भगाते थे ,शरारते करते थे, जलती हुई लकड़ी को मुंह मे डालकर बीड़ी की तरह कस भी लगाते थे, अहा! क्या दृश्य होता था तवे पर गर्म गर्म सोगरे बनते जाते थे , सर्दियों की वजह से घी जम जाता था सो जितना हमसे निकलता था इतना बड़ा घी का लोंदा सोगरे पर रख देते थे और घी को बर्फ की तरह पिघलते देखते थे , हमारे इस अंदाज पर तवा हंसता था और मां कहती थी-- छोकरो तवो हसे है कोय परोमणओ आवये चूल्हे की आगण पर बैठने के लिए हम आपस मे जब लड़ते थे तब मां बारी बारी से अपनी गोद मे हमे ले लेती थी साक्षात अन्नपूर्णा देवी जैसी मां हर घर मे होती थी । अब तो मालूम ही नही कब खाना बनता है, कौन बनाता है, पहले ममतामयी मां को देखते देखते खाना खाते थे अब मोबाइल देखते देखते यूँही जबरन मुंह मे निवाला ठूसते है। ...
परिहारों की कुलदेवी : गाजणमाता मंदिर
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राजस्थान के पाली जनपद में धरमदारी गांव में, पाली से १५ कि.मी.ऊपर पहाडी पर गाजणमाता का देवस्थान है । इस मंदिर की स्थापना १०५० वर्ष पूर्व हुई थी । मंदिर परिसर के आसपास १५ कि.मी.तक जंगल है । आषाढ शुक्ल पक्ष ९ (१३.७.२०१६)को यहां उत्सव हुआ था । इस निमित्त देवी गाजणमाता की महिमा इस लेख द्वारा प्रस्तुत कर रहे हैं । मंदिर का इतिहास बहुत वर्ष पूर्व जोधपुर में राजा परिहारों का राज था । उनकी कुलदेवी चामुण्डा माता थी । अपने राजपुत्र के विवाह हेतु राजा ने देवी चामुण्डा से बारात में चलने की प्रार्थना की,तब देवी मां ने वचन दिया -मैं तेरे साथ चलती हूं । परंतु जहां मुझे कोई भक्त रोक देगा,मैं वहीं रुक जाऊंगी । बारात में जालोर जनपद के रमणीयां गांव के कृपासिंहजी भी अपनी १००० गायें लेकर आए थे । बारात जंगल से जा रही थी । साथ चल रहे रथ,घोडों और संगीत की ध्वनि से गायें डरकर भडक गईं । तब कृपासिंहजी ने गौमाता को पुकारा,हे मां !हे मां ! उसी क्षण मां चामुण्डा पहाड फाडकर अंतर्धा...